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कर्ण पर्व
अध्याय ५
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धृतराष्ट्र उवाच
कच्चिन्न नीचाचरितं कृतवांस्तात संय़ुगे |  ४७   क
कच्चिन्न निहतः शूरो यथा न क्षत्रिय़ा हताः ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति