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विराट पर्व
अध्याय ५
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वैशम्पाय़न उवाच
ततो यथाप्रतिज्ञाभिः प्राविशन्नगरं महत् |  ३१   क
अज्ञातचर्यां वत्स्यन्तो राष्ट्रे वर्षं त्रय़ोदशम् ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति