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द्रोण पर्व
अध्याय २५
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सञ्जय़ उवाच
स कुञ्जरस्थो रथिभिः शुशुभे सर्वतो वृतः |  ३३   क
पर्वते वनमध्यस्थो ज्वलन्निव हुताशनः ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति