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शल्य पर्व
अध्याय ४७
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वैशम्पाय़न उवाच
सा तं दृष्ट्वोग्रतपसं वसिष्ठं तपतां वरम् |  ७   क
आचारैर्मुनिभिर्दृष्टैः पूजय़ामास भारत ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति