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शल्य पर्व
अध्याय ९
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सञ्जय़ उवाच
स शरैः सर्वतो विद्धः प्रहृष्ट इव पाण्डवः |  २४   क
अन्यत्कार्मुकमादाय़ रथमारुह्य वीर्यवान् |  २४   ख
अतिष्ठत रणे वीरः क्रुद्धरूप इवान्तकः ||  २४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति