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शल्य पर्व
अध्याय ९
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सञ्जय़ उवाच
ततोऽधिरुह्य नकुलः सुतसोमस्य तं रथम् |  ४२   क
शुशुभे भरतश्रेष्ठो गिरिस्थ इव केसरी |  ४२   ख
सोऽन्यत्कार्मुकमादाय़ सुषेणं समय़ोधय़त् ||  ४२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति