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शल्य पर्व
अध्याय ९
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सञ्जय़ उवाच
स हतः प्रापतद्राजन्नकुलेन महात्मना |  ४८   क
नदीवेगादिवारुग्णस्तीरजः पादपो महान् ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति