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शल्य पर्व
अध्याय ९
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सञ्जय़ उवाच
यथा देवासुरं युद्धं पूर्वमासीद्विशां पते |  ५८   क
अभीतानां तथा राजन्यमराष्ट्रविवर्धनम् ||  ५८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति