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आदि पर्व
अध्याय ९०
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वैशम्पाय़न उवाच
यं यं कराभ्यां स्पृशति जीर्णं स सुखमश्नुते |  ४८   क
पुनर्युवा च भवति तस्मात्तं शन्तनुं विदुः ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति