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आदि पर्व
अध्याय ९०
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वैशम्पाय़न उवाच
स वाणविद्ध उवाच पाण्डुम् |  ६५   क
चरता धर्ममिमं येन त्वय़ाभिज्ञेन कामरसस्याहमनवाप्तकामरसोऽभिहतस्तस्मात्त्वमप्येतामवस्थामासाद्यानवाप्तकामरसः पञ्चत्वमाप्स्यसि क्षिप्रमेवेति ||  ६५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति