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शान्ति पर्व
अध्याय ३३५
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व्यास उवाच
विद्यासहाय़वान्देवो विष्वक्सेनो हरिः प्रभुः |  १७   क
अप्स्वेव शय़नं चक्रे निद्राय़ोगमुपागतः |  १७   ख
जगतश्चिन्तय़न्सृष्टिं चित्रां वहुगुणोद्भवाम् ||  १७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति