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शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
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जनमेजय़ उवाच
किं नु व्रह्मा च रुद्रश्च शक्रश्च वलभित्प्रभुः |  ८   क
सूर्यस्ताराधिपो वाय़ुरग्निर्वरुण एव च |  ८   ख
आकाशं जगती चैव ये च शेषा दिवौकसः ||  ८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति