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शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
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भीष्म उवाच
आकिञ्चन्ये न मोक्षोऽस्ति कैञ्चन्ये नास्ति वन्धनम् |  ५०   क
कैञ्चन्ये चेतरे चैव जन्तुर्ज्ञानेन मुच्यते ||  ५०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति