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वन पर्व
अध्याय २४५
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वैशम्पाय़न उवाच
मान्यान्मानय़िता जन्म कुले महति विन्दति |  २४   क
व्यसनैर्न तु संय़ोगं प्राप्नोति विजितेन्द्रिय़ः ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति