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भीष्म पर्व
अध्याय ११५
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सञ्जय़ उवाच
अनुरूपं शय़ानस्य पाण्डवोपहितं त्वय़ा |  ४५   क
यद्यन्यथा प्रवर्तेथाः शपेय़ं त्वामहं रुषा ||  ४५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति