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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९०
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वैशम्पाय़न उवाच
एवमेव महाराज दक्षिणां त्रिगुणां कुरु |  १४   क
त्रित्वं व्रजतु ते राजन्व्राह्मणा ह्यत्र कारणम् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति