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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३४
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वासुदेव उवाच
मनो मे व्राह्मणं विद्धि वुद्धिं मे विद्धि व्राह्मणीम् |  १२   क
क्षेत्रज्ञ इति यश्चोक्तः सोऽहमेव धनञ्जय़ ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति