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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३६
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वैशम्पाय़न उवाच
विदितं मम राजेन्द्र यत्ते हृदि विवक्षितम् |  १६   क
दह्यमानस्य शोकेन तव पुत्रकृतेन वै ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति