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वन पर्व
अध्याय ९०
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युधिष्ठिर उवाच
न हर्षात्सम्प्रपश्यामि वाक्यस्यास्योत्तरं क्वचित् |  १४   क
स्मरेद्धि देवराजो यं किं नामाभ्यधिकं ततः ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति