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वन पर्व
अध्याय ९०
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युधिष्ठिर उवाच
भवता सङ्गमो यस्य भ्राता यस्य धनञ्जय़ः |  १५   क
वासवः स्मरते यस्य को नामाभ्यधिकस्ततः ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति