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वन पर्व
अध्याय २००
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व्याध उवाच
धर्मात्मा भवति ह्येवं चित्तं चास्य प्रसीदति |  ४५   क
स मैत्रजनसन्तुष्ट इह प्रेत्य च नन्दति ||  ४५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति