वन पर्व  अध्याय २६५

मार्कण्डेय़ उवाच

भजस्व मां वरारोहे महार्हाभरणाम्वरा |  ९   क
भव मे सर्वनारीणामुत्तमा वरवर्णिनि ||  ९   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति