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शल्य पर्व
अध्याय ३
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सञ्जय़ उवाच
प्रमुखस्थे तदा कर्णे वलं पाण्डवरक्षितम् |  ३८   क
दुरासदं तथा गुप्तं गूढं गाण्डीवधन्वना ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति