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वन पर्व
अध्याय २३०
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वैशम्पाय़न उवाच
भूय़श्च योधय़ामासुः कृत्वा कर्णमथाग्रतः |  १८   क
महता रथघोषेण हय़चारेण चाप्युत |  १८   ख
वैकर्तनं परीप्सन्तो गन्धर्वान्समवारय़न् ||  १८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति