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भीष्म पर्व
अध्याय ९०
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सञ्जय़ उवाच
स विस्फार्य महच्चापं द्रौणिं विव्याध पत्रिणा |  २८   क
यथा शक्रो महाराज पुरा विव्याध दानवम् ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति