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द्रोण पर्व
अध्याय ९०
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सञ्जय़ उवाच
शिखण्डी चापि हार्दिक्यं विद्ध्वा पञ्चभिराशुगैः |  १३   क
पुनर्विव्याध विंशत्या साय़कानां हसन्निव ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति