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द्रोण पर्व
अध्याय ९०
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सञ्जय़ उवाच
तव निर्गुणतां ज्ञात्वा पक्षपातं सुतेषु च |  २   क
द्वैधीभावं तथा धर्मे पाण्डवेषु च मत्सरम् |  २   ख
आर्तप्रलापांश्च वहून्मनुजाधिपसत्तम ||  २   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति