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उद्योग पर्व
अध्याय ४७
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सञ्जय़ उवाच
गोमाय़ुसङ्घाश्च वदन्ति रात्रौ; रक्षांस्यथो निष्पतन्त्यन्तरिक्षात् |  ९८   क
मृगाः शृगालाः शितिकण्ठाश्च काका; गृध्रा वडाश्चैव तरक्षवश्च ||  ९८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति