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द्रोण पर्व
अध्याय ९०
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सञ्जय़ उवाच
स तस्य सशरं चापं छित्त्वा सङ्ख्ये महानसिः |  ३१   क
अभ्यगाद्धरणीं राजंश्च्युतं ज्योतिरिवाम्वरात् ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति