कर्ण पर्व  अध्याय २२

सञ्जय़ उवाच

तत्त्विदानीमतिक्रम्य मा शुचो भरतर्षभ |  २८   क
शृणु सर्वं यथावृत्तं घोरं वैशसमच्युत ||  २८   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति