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द्रोण पर्व
अध्याय १२८
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सञ्जय़ उवाच
प्रत्युद्ययुस्तं त्वरिताः पाञ्चाला राजगृद्धिनः |  ३३   क
तान्द्रोणः प्रतिजग्राह परीप्सन्कुरुसत्तमम् |  ३३   ख
चण्डवातोद्धतान्मेघान्निघ्नन्रश्मिमुचो यथा ||  ३३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति