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द्रोण पर्व
अध्याय ९०
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सञ्जय़ उवाच
आत्मापराधात्सुमहान्प्राप्तस्ते विपुलः क्षय़ः |  ४   क
न हि ते सुकृतं किञ्चिदादौ मध्ये च भारत |  ४   ख
दृश्यते पृष्ठतश्चैव त्वन्मूलो हि पराजय़ः ||  ४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति