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द्रोण पर्व
अध्याय ९०
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सञ्जय़ उवाच
शिखण्डिनं तथा ज्ञात्वा हार्दिक्यशरपीडितम् |  ४४   क
अपोवाह रणाद्यन्ता त्वरमाणो महारथम् ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति