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उद्योग पर्व
अध्याय ५८
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सञ्जय़ उवाच
पादाङ्गुलीरभिप्रेक्षन्प्रय़तोऽहं कृताञ्जलिः |  ३   क
शुद्धान्तं प्राविशं राजन्नाख्यातुं नरदेवय़ोः ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति