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द्रोण पर्व
अध्याय ९०
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सञ्जय़ उवाच
ते द्राव्यमाणाः समरे हार्दिक्येन महारथाः |  ५०   क
विमुखाः समपद्यन्त शरवृष्टिभिरर्दिताः ||  ५०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति