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द्रोण पर्व
अध्याय १३८
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सञ्जय़ उवाच
महाधनैराभरणैश्च दिव्यैः; शस्त्रैः प्रदीप्तैरभिसम्पतद्भिः |  १४   क
क्षणेन सर्वे विहिताः प्रदीपा; व्यदीपय़ंश्च ध्वजिनीं तदाशु ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति