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शान्ति पर्व
अध्याय ५४
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वासुदेव उवाच
जन्मप्रभृति ते कश्चिद्वृजिनं न ददर्श ह |  ३५   क
ज्ञातारमनुधर्माणां त्वां विदुः सर्वपार्थिवाः ||  ३५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति