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शान्ति पर्व
अध्याय ९१
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उतथ्य उवाच
क्षत्रिय़स्य प्रमत्तस्य दोषः सञ्जाय़ते महान् |  ३३   क
अधर्माः सम्प्रवर्तन्ते प्रजासङ्करकारकाः ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति