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द्रोण पर्व
अध्याय १२१
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सञ्जय़ उवाच
अहरत्तत्पुनश्चैव शरैरूर्ध्वं धनञ्जय़ः |  ३३   क
दुर्हृदामप्रहर्षाय़ सुहृदां हर्षणाय़ च ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति