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विराट पर्व
अध्याय २८
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वैशम्पाय़न उवाच
सान्त्वय़ित्वा च मित्राणि वलं चाभाष्यतां सुखम् |  १२   क
सकोशवलसंवृद्धः सम्यक्सिद्धिमवाप्स्यसि ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति