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वन पर्व
अध्याय ९१
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वैशम्पाय़न उवाच
यदि ते व्राह्मणेष्वस्ति काचित्प्रीतिर्जनाधिप |  ११   क
कुरु क्षिप्रं वचोऽस्माकं ततः श्रेय़ोऽभिपत्स्यसे ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति