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द्रोण पर्व
अध्याय ९२
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सञ्जय़ उवाच
विधुन्वानो धनुःश्रेष्ठं चोदय़ंश्चैव वाजिनः |  २६   क
भर्त्सय़न्सारथिं चोग्रं याहि याहीति सत्वरः ||  २६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति