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द्रोण पर्व
अध्याय ११०
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धृतराष्ट्र उवाच
तत्र तं निर्जितं दृष्ट्वा भुजङ्गमिव निर्विषम् |  ५   क
युद्धात्कर्णमपक्रान्तं किं स्विद्दुर्योधनोऽव्रवीत् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति