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द्रोण पर्व
अध्याय ९१
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सञ्जय़ उवाच
यदेतन्मेघसङ्काशं द्रोणानीकस्य सव्यतः |  १२   क
सुमहत्कुञ्जरानीकं यस्य रुक्मरथो मुखम् ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति