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द्रोण पर्व
अध्याय ९१
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सञ्जय़ उवाच
आपतन्तं रथं तं तु शङ्खवर्णैर्हय़ोत्तमैः |  १८   क
परिवव्रुस्ततः शूरा गजानीकेन सर्वतः |  १८   ख
किरन्तो विविधांस्तीक्ष्णान्साय़काँल्लघुवेधिनः ||  १८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति