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द्रोण पर्व
अध्याय ९१
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सञ्जय़ उवाच
सम्भिन्नवर्मघण्टाश्च संनिकृत्तमहाध्वजाः |  २२   क
हतारोहा दिशो राजन्भेजिरे भ्रष्टकम्वलाः ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति