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द्रोण पर्व
अध्याय ९१
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सञ्जय़ उवाच
चापं च रुक्मविकृतं विधुन्वन्गजमूर्धनि |  २७   क
अशोभत महाराज सविद्युदिव तोय़दः ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति