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द्रोण पर्व
अध्याय ९१
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सञ्जय़ उवाच
शैनेय़स्य धनुश्छित्त्वा स खड्गो न्यपतन्महीम् |  ४१   क
अलातचक्रवच्चैव व्यरोचत महीं गतः ||  ४१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति