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द्रोण पर्व
अध्याय ९१
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सञ्जय़ उवाच
ततः प्रववृते युद्धं कुरूणां सात्वतस्य च |  ५४   क
द्रोणस्य च रणे राजन्घोरं देवासुरोपमम् ||  ५४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति