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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १९
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व्राह्मण उवाच
पुरस्याभ्यन्तरे तिष्ठन्यस्मिन्नावसथे वसेत् |  ३२   क
तस्मिन्नावसथे धार्यं सवाह्याभ्यन्तरं मनः ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति